राधा की झोपड़ी गांव के किनारे थी, जहाँ धूल भरी मिट्टी और टूटी-फूटी ईंटें उसका घर बनाती थीं। उसका पति राम रोज़ भोर में निकल जाता था खेतों में काम करने। दिन भर धूप में, रात को थकान से लथपथ। पर दिवाली आते ही कुछ और ही बात हो जाती थी उनके घर में। इस साल भी राधा ने अपनी सखियों से पूछा था, ‘दिवाली कैसे मनाएंगे? महीने भर की जमा पैसे तो अनाज खरीदने में खर्च हो गए।’ तब उसकी सास ने हँसते हुए कहा था, ‘बेटा, दिवाली तो हृदय में रहती है, दीये में नहीं।’
दिवाली के दिन राधा ने गन्ने के रस से शक्कर बनाई थी। बस इतनी ही। खेतों में काम करते हुए मिले गन्ने के टुकड़े, जिन्हें उसने संभाल रखा था। बेटी सीता ने पूछा, ‘माँ, हमारे पास मिठाई नहीं है?’ राधा ने उसके माथे को छुआ और कहा, ‘हमारी मिठाई तो अपने हाथों से बनी है, बेटा। इससे बढ़कर कोई मिठाई नहीं।’ शाम को जब राम घर लौटा, तो राधा ने उसे अपने बनाए गन्ने की शक्कर के टुकड़े खिलाए। उसकी आँखों में खुशी की चमक थी।
दीये के लिए भी घर में मिट्टी नहीं थी, तो राधा ने खेत की काली मिट्टी को हाथों से साँचा। उसकी बेटी सीता और बहू ने साथ में बैठकर छोटे-छोटे दीये बनाए। हर दीये में प्रेम था, हर दीये में अरमान थी। रात को जब उन्होंने उन दीयों को आँगन में सजाया, तो पूरी झोपड़ी रोशनी से भर गई। पड़ोस की गरीब महिलाएं भी आ गईं उस रोशनी देखने। किसी के पास घी नहीं था, तो किसी के पास तेल नहीं, पर सब ने मिलकर कुछ तेल जुटाया और दीये जला दिए।
राधा ने अपनी साँस-बहू के साथ मिलकर आटा भूनी और सूजी का हलवा बना दिया। कोई मेवे नहीं थे, पर उसने खेत से तोड़े गए तिल बिखेर दिए। जब पूरा परिवार आँगन में बैठकर खाना खा रहा था, तब राम ने राधा के हाथ को पकड़ा। उसकी आँखों में पानी था। उसने कहा, ‘तुमने मुझे सबसे बड़ी दिवाली दे दी, राधा। खुशी की।’ बेटी सीता ने पूछा, ‘पापा, क्या अमीर लोगों के पास इससे भी ज़्यादा खुशी होती है?’ राम ने अपनी बेटी को गोद में बैठाया और कहा, ‘नहीं, बेटा। अमीर के पास मिठाई होती है, पर हमारे पास प्रेम है। और प्रेम की मिठाई कभी खत्म नहीं होती।’
उस रात झोपड़ी के दीये सवेरे तक जलते रहे। पड़ोसियों की झोपड़ियों में भी उसकी रोशनी पहुँची। राधा उस रात सोई नहीं। वह अपने आँगन में बैठी रही, अपने प्रेम की रोशनी को देखती रही। उसे एहसास हुआ कि दिवाली महज़ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भावना है। वह दिवाली जो गरीबी में भी खुशी ढूँढ लेती है, जो साधारण चीजों को असाधारण बना देती है, जो परिवार को एक-दूसरे के करीब ले आती है।
🪔 सीख: दिवाली केवल दीयों और मिठाइयों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भावनाओं और आपस के रिश्तों का पर्व है। सच्ची खुशी साधनों में नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और परिवार के प्रति समर्पण में निहित होती है। गरीबी में भी जब प्रेम हो, तो हर पल पूजा बन जाता है।

