गांव का कवि

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हरिहर के हाथों में कलम कभी नहीं आई, लेकिन उसके शब्दों में जादू था। गांव के इस सीधे-सादे किसान को किताबें पढ़नी नहीं आती थीं, पर जिंदगी का हर पन्ना उसने बस देखकर, महसूस करके सीख लिया था। उसकी उम्र पचास के करीब थी, धूप से काली पड़ी त्वचा और खेतों की मिट्टी से सने कपड़े उसकी पहचान थे।

हर शाम जब हरिहर अपने खेत से लौटता था, तो गांव के लड़के-बूढ़े, बहू-बेटियां, सब चौपाल पर इकट्ठा हो जाते थे। वह आंगन के बीच बैठ जाता था, अपनी धोती को ठीक करता था, और फिर शुरू हो जाती थी उसकी कविता। कोई लिखी हुई कविता नहीं, बस उसके मुंह से निकली शब्दों की बारिश।

एक दिन जब गांव में सूखा पड़ा था, खेतों में न पानी था, न फसल की उम्मीद। पूरा गांव मायूस था। हरिहर उस दोपहर अपने सूखे खेत में खड़ा था, रेतीली मिट्टी को हाथों में कसता हुआ। शाम को जब वह चौपाल पर बैठा, तो उसकी आवाज़ में दर्द था, लेकिन आशा भी थी। उसने कहा, ‘देखो भाइयों, यह सूखी मिट्टी भी अपना दर्द बताती है। जैसे मां का दिल तुम्हारे सूखे हुए से भीग जाता है, वैसे ही बादल भी तुम्हारा रोना सुन लेंगे। डर मत खाओ, जो बीज तुमने बोया है, वो कहीं तो जाएगा।’

उसकी बातें सुनकर गांव के बुजुर्ग रो गए। बच्चों के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। और सच ही, दो हफ्ते बाद बारिश हुई। गांव में फिर से जीवन लौट आया।

जब हरिहर की बेटी की शादी होने वाली थी, तो दहेज़ की बात पर गांव के कुछ लोग ताने कसने लगे। हरिहर ने कहा, ‘मेरी बेटी का दहेज़ क्या है? यह कि उसके पिता का दिल पवित्र है। यह कि उसकी मां ने उसे प्यार से पाला है। यह कि गांव ने उसे लुलाया है। इससे ज़्यादा सोना नहीं है इस दुनिया में।’ उसकी वह कविता इतनी गहरी थी कि दूल्हे के पिता ने खुद बेटी के पैर छुए।

साल दर साल, हरिहर की कविताएं गांव की रूह बन गईं। दुखों में सांत्वना, खुशियों में उत्साह, और हर मौसम में उसके शब्द गांव को जीवित रखते थे। अनपढ़ होते हुए भी, वह सबसे बड़ा कवि था। क्योंकि उसकी कविताएं किताबों में नहीं, गांव के लोगों के दिलों में लिखी थीं।


🪔 सीख: असली ज्ञान किताबों में नहीं, जीवन के अनुभव में मिलता है। सच्चे कवि वह नहीं जो शब्दों को लिखता है, बल्कि वह है जो लोगों के दिलों को छूता है और उन्हें उम्मीद देता है।

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