बिहार के एक छोटे गाँव में सरसों के विशाल पीले खेत थे जहाँ हर साल वसंत आते ही सूरज की चादर बिछ जाती थी। इसी खेत के पास ही रहते थे दो भाई — दस साल का राज और आठ साल का संजय। उनका घर खपरैल की छत वाला था, और खेत उनके घर से सिर्फ पचास कदम दूर।
संजय का जन्म कब हुआ, यह किसी को पता नहीं था। माता-पिता अपनी ग़रीबी में इतना ध्यान नहीं रख सके। राज को भी इस बात की कोई चिंता नहीं थी। जब संजय छोटा था, तो राज उसे अपनी पीठ पर बैठाकर खेतों में घूमा करता था, और संजय सिर्फ हँसता था।
एक दिन, जनवरी की सुबह जब सरसों की फसल अपनी चरम पर थी, राज ने संजय को अपने साथ खेत जाने के लिए कहा। सूरज निकल रहा था, और पूरा खेत सोने जैसा दिख रहा था। संजय की आँखें खुल गईं। उसने कभी इतना सुंदर दृश्य नहीं देखा था।
‘भइया, यह सब किसका है?’ संजय ने पूछा।
‘हमारा,’ राज ने मुस्कुराते हुए कहा, हालाँकि जमीन सचमुच कर्जे की थी।
राज ने संजय के हाथ पकड़े और उसे सरसों के फूलों के बीच दौड़ने दिया। संजय के पाँव पीली फसल को चीरते थे, और हर पँखुड़ी उसके कपड़ों से चिपक जाती थी। छोटा भाई खिलखिलाकर हँसता था, जैसे उसने दुनिया का सबसे बड़ा खजाना पा लिया हो।
‘देख, संजय,’ राज बैठ गया और अपने छोटे भाई को गोद में बैठाया। ‘ये सरसों के फूल हमेशा एक-दूसरे को सहारा देते हैं। अकेला फूल कभी टूटता नहीं, पर भीड़ में वह मजबूत रहता है। हम भी ऐसे ही होंगे।’
संजय को समझ नहीं आया, लेकिन उसने अपना सिर राज की छाती पर रख दिया। वे दोनों सरसों के खेत में बैठे रहे, जब तक धूप तेज़ न हो गई। पीले फूलों की खुशबू हवा में थी, और दोनों भाइयों के बीच कोई शब्द नहीं था — सिर्फ एक शांत, गहरी दोस्ती थी।
साल बीत गए। राज बड़ा हो गया और शहर जाकर काम करने लगा। संजय स्कूल जाने लगा। पर हर साल, जब सरसों के फूल आते थे, तो दोनों भाई फिर से उसी खेत में मिलते थे। राज अब संजय को अपनी पीठ पर नहीं बैठाता था — अब संजय राज के कंधे पर हाथ रख देता था — पर उनके बीच वही भाषा थी। सरसों की पीली भाषा, जिसमें कोई शब्द नहीं, सिर्फ प्रेम है।
🪔 सीख: असली रिश्ते शब्दों में नहीं बल्कि साझे पलों में बसते हैं। भाईचारा और दोस्ती को न तो समय तोड़ सकता है, न दूरी। छोटी-छोटी खुशियों में बसा प्रेम ही जीवन को सार्थक बनाता है।

