पंचायत गांव के किनारे बहती नर्मदा नदी थी। सदियों से यह गांव की जीवनरेखा थी। हर घर में नदी के पानी का महत्व था, हर त्योहार पर नदी के तट पर पूजा होती थी। गांववासी नदी को माता कहते थे और उसकी सेवा को अपना धर्म समझते थे।
दस साल की मेहरा को सबसे प्यारी जगह नदी के किनारे की वह पुरानी बरगद की जड़ें थीं। हर सुबह वह अपनी दादी के साथ जल भरने जाती थी। दादी कहतीं, ‘बेटा, नदी सिर्फ पानी नहीं देती, वह हमें सिखाती है कि जीवन कैसे बहना चाहिए – बिना रुके, बिना शिकायत किए।’
एक साल की गर्मी आई जब सूखा पड़ गया। गांव के सभी कुएं सूख गए। खेत फटने लगे। आस-पास की नर्मदा भी बहुत कम पानी के साथ बह रही थी। गांववासी चिंतित हो गए। बुजुर्गों की मानें तो जब प्रकृति क्रोधित होती है, तब उसे शांत करने के लिए दिल की सच्ची पूजा होनी चाहिए।
मेहरा अपनी दादी के साथ नदी के किनारे गई। नदी तो बहुत दुर्बल दिख रही थी – जैसे कोई बीमार माता हो। मेहरा ने अपनी छोटी-सी कमर में बंधी गुड़िया नदी को समर्पित कर दी। दादी के साथ उसने नदी के किनारे लगे सभी वृक्षों को पानी दिया – पहले अपने बर्तन का हर बूंद नदी को अर्पित की।
उसी रात, मेहरा ने एक सपना देखा। नदी एक सुंदर स्त्री के रूप में उसके सामने आई और कहा, ‘बेटा, तुम्हारे प्रेम की समझ ने मेरा दिल जीत लिया। जब बच्चे सच्चे मन से प्रकृति से जुड़ते हैं, तब आसमान भी सुन लेता है।’
अगली सुबह गांव को अनोखी बरसात हुई। तीन दिन तक बारिश होती रही। नदी फिर से बहने लगी। खेत हरे हो गए। कुएं भर गए। गांववासी नदी के तट पर इकट्ठा हुए और नदी के लिए धन्यवाद गीत गाए।
मेहरा की दादी ने उसे गले लगाया और कहा, ‘बेटा, प्रकृति सिर्फ देती नहीं, वह सच्चे प्रेम को भी महसूस करती है। जब हम धरती, नदी और पेड़ों से प्रेम करते हैं, तब वे भी हमारी रक्षा करते हैं।’ उसी दिन से मेहरा ने गांव के सभी बच्चों को नदी की देखभाल की शिक्षा दी। हर मौसम में वह और उसके साथी नदी के किनारे पेड़ लगाते, पानी की निर्मलता बनाए रखते।
साल दर साल गुजरते गए। पंचायत गांव की नदी और भी सुंदर हो गई। इसकी वजह थी एक छोटी सी लड़की का बड़ा प्रेम, जिसने समझा कि प्रकृति के साथ रिश्ता सिर्फ लेने का नहीं, बल्कि देने और सेवा का भी होता है।
🪔 सीख: प्रकृति हमारा सबसे बड़ा शिक्षक है। जब हम सच्चे मन से अपनी धरती, नदियों और वृक्षों को प्रेम करते हैं, तो वे भी हमारी देखभाल करती हैं। जीवन को नदी की तरह प्रवाहमान रहना चाहिए – निरंतर, निःस्वार्थ और सबको जीवन देने वाली।

