सपेरे की रहस्यमयी बीन

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गांव के चौराहे पर एक अजनबी सपेरा आया था। उसकी पीठ पर टोकरी थी और हाथ में एक बीन। बीन पुरानी थी, लकड़ी मांजी हुई, किसी ज़माने की, जिसमें उकेरी गई थीं अजीब-अजीब आकृतियां। गांव के लड़कों की भीड़ उसके पीछे लग गई, पर बुजुर्गों की नज़रें संदेह से भर गईं। कोई भी नहीं जानता था यह सपेरा कहां से आया है।

शाम को जब सपेरे ने अपनी बीन बजाई, तो गांव में एक अलग ही जादू छा गया। सांपों का नृत्य सब कुछ भूल गया। लेकिन असली चमत्कार तो कुछ और था। जैसे ही बीन की धुन सुनाई देती, गांव के सबसे बीमार व्यक्ति—पंडित जी का पोता राजू—जो बिस्तर पर पड़ा था, अपनी आंखें खोल देता था। उसका बुखार कम हो जाता था। उसका चेहरा शांत हो जाता था।

तीसरे दिन, गांव के जमींदार की बेटी अंजली, जो गत छः महीने से गूंगी रह गई थी, सपेरे की बीन की आवाज़ सुनकर अचानक बोल उठी। एक शब्द। फिर दूसरा। लोग अवाक रह गए। पंडित जी को संदेह हुआ। उन्होंने सपेरे को चेतावनी दी कि यह जादू नहीं, तो चुड़ैल विद्या है। गांव के किसी को यह पसंद नहीं आया।

अगली रात, जमींदार के लड़कों ने सपेरे को पकड़ने का फैसला किया। लेकिन जब वे उसके तंबू तक पहुंचे, तो वहां कोई नहीं था। सिर्फ बीन बची थी, टोकरी के अंदर, एक सफ़ेद कागज़ के साथ लिखा था—’बीन उसी को मिलेगी जो समझे कि संगीत दवा है, न कि जादू।’

महीनों बाद, गांव के सबसे विनम्र और सच्चे दिल वाले शिक्षक को वह बीन मिली। उन्होंने उसे सीखा, उसे संभाला। वे हर शाम बच्चों को बीन सिखाते। धीरे-धीरे, पूरे गांव का रोग ठीक हो गया। दुःख कम हो गया। और सपेरा? वह कहीं चला गया, पर उसकी बीन हमेशा गांव में रही, हर सुर में अपना जादू बिखेरती।


🪔 सीख: सच्चा ज्ञान और प्रेम हमेशा बेनकाब होता है। अगर आप किसी चीज़ को सच्चे मन से सीखते हैं, तो वह आपका हो जाती है, और दूसरों को भी सुख देती है।

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