राज के पिता जब परदेश गए थे, तब वह महज पाँच साल का था। गाँव के चौपाल पर बैठे बुजुर्गों ने कहा था कि शहर में सोने की बारिश होती है। राज की माँ ने उसे गले लगाया था और कहा था, ‘पापा तुम्हारे लिए नया घर बनाएँगे।’ पर घर बनाने की जगह, पिता ने शहर में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया।
बीस साल बीत गए। राज अब इंजीनियर बन गया, शहर में उसका अच्छा काम था। हर महीने वह परिवार को पैसे भेजता था। माँ उन पैसों से गाँव में एक पक्का घर बना गई। नई ईंटें, नई छत, बिजली के तार—सब कुछ नया था। पर राज कभी वापस नहीं गया।
एक दिन फोन पर माँ ने रोते हुए कहा, ‘तुम्हारे पापा की याद आ रही है।’ राज ने जवाब दिया, ‘माँ, अगले महीने छुट्टी लूँगा।’ पर छुट्टी कभी नहीं ली। प्रोजेक्ट, मीटिंग, प्रमोशन—जीवन इतना भरा हुआ था कि गाँव की बातें भूल गई।
एक रात, राज के सपने में वह छोटा बच्चा दिख गया जो अपने पिता की राह देखता था। वह दृश्य—माँ दरवाज़े पर खड़ी होकर राह देख रही थी, खेतों में पिता का पसीना, दादी की कहानियाँ, पीपल के पेड़ के नीचे की ठंडी छाया। सब कुछ एक पल में जीवंत हो उठा।
सुबह राज ने ट्रेन की टिकट बुक कर दी। गाँव पहुँचते ही उसका दिल तेज़ हो गया। अपना वही पुराना घर—छत पर छिपी खपरैलें, दीवारों पर माँ के हाथों से बनाई गई पेंटिंग। दरवाज़ा खुला और माँ दिख गई। कितनी बुजुर्ग हो गई थी वह।
परिवार ने खीर बनाई, तहरी की सब्ज़ी। पड़ोस के लोग आ गए। पर राज को सबसे ज़्यादा ख़ुशी तब हुई जब उसने माँ के हाथों से पकाई गई रोटी खाई। हर कौर में गाँव की माटी की खुशबू थी।
अगले दिन राज अपने पिता की कब्र पर गया। वहाँ बैठकर रो गया। परदेश में कमाया था पर घर को खो दिया था। लेकिन तब भी माँ की प्रतीक्षा अधूरी नहीं रही। राज ने उसी दिन फैसला कर लिया कि अब वह हर महीने गाँव आएगा। परदेश में जो सोना कमाया था, वह माँ के पैरों तले धूल समान था।
परदेश की यादें—वे सिर्फ दूरी नहीं थीं, वे हर रात की बेकली, हर छुट्टी का इंतज़ार, और आख़िरकार, घर लौटने की बेचैनी थीं। राज समझ गया कि सबसे बड़ा सोना तो माँ की मुस्कुराहट थी।
🪔 सीख: परदेश में कितना भी सफल हो जाओ, घर और माता-पिता का प्यार कभी नहीं भूलना चाहिए। धन और सम्मान अर्थहीन हैं अगर प्रियजन साथ न हों। परिवार के साथ समय बिताना सबसे बड़ी दौलत है।

