गांव के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में रीता रहती थी। उसके पास दो बेटे थे – राज और रवि। उनका पिता दो साल पहले चल बसा था, और तब से रीता अकेली ही सब कुछ संभाल रही थी।
गर्मी के दिन थे। खेत सूख गए थे। गांव के अन्य किसानों ने कहा, ‘इस साल फसल नहीं होगी।’ लेकिन रीता जानती थी कि उसके बेटों को पढ़ाई जारी रखनी है। स्कूल की फीस का समय पास आ गया था।
हर सुबह होने से पहले ही रीता खेत जाती। धूप में काम करती। पड़ोस की महिलाएं उसे देखतीं और चुप हो जातीं। रीता का शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा था। कभी-कभी वह बेहोश हो जाती, लेकिन फिर भी उठकर काम पर लगती।
राज जब स्कूल से घर आता, तो देखता कि मां के होंठ सूखे हैं। उसके हाथों में दरारें हैं। वह कहता, ‘मां, तुम आराम करो। मैं काम कर दूंगा।’ लेकिन रीता हंसती थी और कहती, ‘तुम्हें पढ़ना है, बेटा। यही मेरा काम है।’
एक दिन गांव की पूरी महिलाओं की टोली रीता के खेत में पहुंची। उन्होंने कहा, ‘अरे, तुम अकेली क्यों हो? हम सब हैं न।’ उस दिन के बाद, हर शाम को सभी महिलाएं मिलकर खेत में काम करतीं। वे गीत गातीं, हंसतीं, और रीता की मदद करतीं।
बरसात आई। आसमान ने खूब पानी बरसाया। खेत हरे हो गए। फसल लहलहाने लगी। रीता के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।
फसल कटने का दिन आया। गांव के सभी लोग मिलकर खेत काटने लगे। जब अनाज तुलवाया गया, तो रीता की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। फसल अच्छी थी – स्कूल की फीस के लिए काफी से ज्यादा।
शाम को जब राज और रवि स्कूल से आए, रीता उन्हें गले लगाती थी। उसने कहा, ‘देखो बेटा, मां की मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। तुम दोनों को पढ़ना है, समझना है, और फिर दुनिया को बदलना है।’
राज ने अपनी मां के चेहरे को छुआ। वह महसूस कर सकता था – हर झुर्री एक कहानी, हर सूखा हुआ होंठ एक प्रेम का प्रतीक। उसने अपने दिल में प्रतिज्ञा की कि वह अपनी मां के सपनों को पूरा करेगा।
आज भी गांव में जब कोई मां अपने बच्चों के लिए संघर्ष करती है, तो लोग रीता की कहानी सुनाते हैं – उस मां की कहानी जिसकी ममता और त्याग का कोई अंत नहीं था।
🪔 सीख: एक मां का प्रेम अमूल्य है। उसकी बलिदान और त्याग किसी भी मुश्किल को आसान बना सकता है। समाज और समुदाय की सहायता से कोई भी असंभव काम संभव हो सकता है। बच्चों का कर्तव्य है कि वे अपनी मां की कद्र करें और उनके सपनों को जीवन दें।

